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Monday, 13 January 2014

फितरत-बेनाम कोहड़ाबाज़ारी

जाके कोई क्या पूछे भी , आदमियत के रास्ते ।
क्या पता किन किन हालातों से गुजरता आदमी ।

चुने किसको हसरतों , जरूरतों के दरमियाँ ।
एक को कसता है तो , दूजे से पिसता आदमी ।

चलता कहाँ जोर ख़ुद की , आदतों पे आदमी का ।
कसने की कोशिश बहुत है , और बिखरता आदमी ।

गलतियाँ करना है फितरत , करता है आदतन ।
और सबक ये सीखना , कि दोहराता है आदमी ।

आदमी है एक प्यासा , और जीवन एक मरुभूमि ।
की दीखता है नीर उसको , पर तरसता आदमी ।

झूठे सच्चे ख्वाबों का , एक पुलिंदा महज है ये ।
एक से बिखरता है , दूजा संवारता आदमी ।

मानता है ख्वाब दुनिया , जानता है ख्वाब दुनिया ।
और टूटे फूटे ख्वाबों का , हिसाब करता आदमी ।

सपने रेतों के जैसे , हाथ से निकले बहुत जो ।
दूर फिसलते रहे , और पकड़ता आदमी ।

आदमी की हसरतों का , क्या बताऊँ दास्ताँ।
आग में जल खाक बनकर , राख मांगे आदमी ।


बेनाम कोहड़ाबाज़ारी

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