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Sunday, 19 April 2015

सारे जहां से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍तां हमारा-इक़बाल

सारे जहां से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍तां हमारा।
हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलिस्‍तां[1] हमारा।।
गुरबत[2] में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में।
समझो वहीं हमें भी दिल हो जहां हमारा।।
परबत वो सबसे ऊँचा हमसाया आस्‍मां का।
      वो संतरी हमारा, वो पासबां[3] हमारा।।
गोदी में खेलती हैं इसकी हज़ारों नदियां।
      गुलशन[4] है जिनके दम से रश्‍के-जना[5] हमारा।।
ऐ आबे-रौदे-गंगा[6] वो दिन हैं याद तुमको।
      उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा।।
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।
      हिन्‍दी हैं हम, वतन है हिन्‍दोस्‍तां हमारा।।
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गए जहां से।
      अब तक मगर है बाक़ी नामों-निशां हमारा।।
कुछ बात है कि हस्‍ती मिटती नहीं हमारी।
      सदियों रहा है दुश्‍मन दौरे-ज़मां[7] हमारा।।
'इकबाल’! कोई महरम[8] अपना नहीं जहां[9] में।
      मालूम क्‍या किसी को दर्दे-‍निहां[10] हमारा।।






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