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Wednesday, 15 April 2015

आ रही रवि की सवारी-रामधारी सिंह दिनकर

नव-किरण का रथ सजा है, 
कलि-कुसुम से पथ सजा है, 
बादलों-से अनुचरों ने स्‍वर्ण की पोशाक धारी। 
आ रही रवि की सवारी।

विहग, बंदी और चारण, 
गा रही है कीर्ति-गायन, 
छोड़कर मैदान भागी, तारकों की फ़ौज सारी। 
आ रही रवि की सवारी।

चाहता, उछलूँ विजय कह, 
पर ठिठकता देखकर यह- 
रात का राजा खड़ा है, राह में बनकर भिखारी। 
आ रही रवि की सवारी।



रामधारी सिंह दिनकर

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