औ’ रोना भी व्यर्थ, मृदुल जब
हुआ व्यथा का भार नहीं,
आँसू पा बढ़ता जाता है,
घटता पारावार नहीं;
जो कुछ मिले भोग लेना है,
फूल हों कि हों शूल सखे!
पश्चाताप यही कि नियति पर
हमें स्वल्प अधिकार नहीं।
हुआ व्यथा का भार नहीं,
आँसू पा बढ़ता जाता है,
घटता पारावार नहीं;
जो कुछ मिले भोग लेना है,
फूल हों कि हों शूल सखे!
पश्चाताप यही कि नियति पर
हमें स्वल्प अधिकार नहीं।
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