मैं इस ब्लॉग का इस्तेमाल अपनी पसंदीदा कविताओं,कहानियों, को दुनिया के सामने लाने के लिए कर रहा हूँ. मैं इस ब्लॉग का इस्तेमाल अव्यावसायिक रूप से कर रहा हूँ.मैं कोशिश करता हूँ कि केवल उन्ही रचनाओं को सामने लाऊँ जो पब्लिक डोमेन में फ्री ऑफ़ कॉस्ट अवेलेबल है . यदि किसी का कॉपीराइट इशू है तो मेरे ईमेल ajayamitabhsuman@gmail.comपर बताए . मैं उन रचनाओं को हटा दूंगा. मेरा उद्देश्य अच्छी कविताओं,कहानियों, को एक जगह लाकर दुनिया के सामने प्रस्तुत करना है.


Tuesday, 12 May 2015

भूकंप-अज्ञात


मैं कैसे अब स्थिर बैठूँ?

विचलित मन को समझाऊँ?

आशाओं पर टिका रहूँ या

कहीं पलायन कर जाऊँ?

.

हे देव ! धरा के रखवाले !

तुम सत्य, शिवा और सुंदर हो 

कितना भी कोलाहल होए

तुम सदा गम्भीर समुंदर हो

.

फिर तुम क्यों हो मचल रहे?

डमरू पर क्यों थिरक रहे?

क्यों रौद्र रूप धारण करके

अपनी रचना ही कुचल रहे?

.

उद्वेग करो वश में अपने

कैलाश को भी आराम मिले 

डमरू के कंपन रोक शिवे! 

धरती को भी विश्राम मिले 

.

तब तक कैसे स्थिर बैठूँ?

कैसे विचलित मन को समझाऊँ?

आशाओं पर टिका रहूँ या

कहीं पलायन कर जाऊँ?

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