मैं कैसे अब स्थिर बैठूँ?
विचलित मन को समझाऊँ?
आशाओं पर टिका रहूँ या
कहीं पलायन कर जाऊँ?
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हे देव ! धरा के रखवाले !
तुम सत्य, शिवा और सुंदर हो
कितना भी कोलाहल होए
तुम सदा गम्भीर समुंदर हो
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फिर तुम क्यों हो मचल रहे?
डमरू पर क्यों थिरक रहे?
क्यों रौद्र रूप धारण करके
अपनी रचना ही कुचल रहे?
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उद्वेग करो वश में अपने
कैलाश को भी आराम मिले
डमरू के कंपन रोक शिवे!
धरती को भी विश्राम मिले
.
तब तक कैसे स्थिर बैठूँ?
कैसे विचलित मन को समझाऊँ?
आशाओं पर टिका रहूँ या
कहीं पलायन कर जाऊँ?
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