खोजते स्वप्न का रूप शून्य
में निरवलम्ब अविराम चलो,
बस की बस इतनी बात, पथिक!
लेते अरूप का नाम चलो।
जिनको न तटी से प्यार, उन्हें
अम्बर में कब आधार मिला?
यह कठिन साधना-भूमि, बन्धु!
मिट्टी को किये प्रणाम चलो।
में निरवलम्ब अविराम चलो,
बस की बस इतनी बात, पथिक!
लेते अरूप का नाम चलो।
जिनको न तटी से प्यार, उन्हें
अम्बर में कब आधार मिला?
यह कठिन साधना-भूमि, बन्धु!
मिट्टी को किये प्रणाम चलो।
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