धरती से व्याकुल आह उठी,
मैं दाह भूमि का सह न सका,
दिल पिघल-पिघल उमड़ा लेकिन,
आँसू बन-बनकर बह न सका।
है सोच मुझे दिन-रात यही,
क्या प्रभु को मुख दिखलाऊँगा?
जो कुछ कहने मैं आया था,
वह भेद किसी से कह न सका।
मैं दाह भूमि का सह न सका,
दिल पिघल-पिघल उमड़ा लेकिन,
आँसू बन-बनकर बह न सका।
है सोच मुझे दिन-रात यही,
क्या प्रभु को मुख दिखलाऊँगा?
जो कुछ कहने मैं आया था,
वह भेद किसी से कह न सका।
No comments:
Post a Comment