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Saturday, 20 June 2015

देवता की याचना-केदारनाथ मिश्र 'प्रभात'

इतना विस्तृत आकाश-अकेला मैं हूँ 
तुम अपने सपनों का अधिवास मुझे दो। 
नीला-नीला विस्तार, हिलोरों में यों ही बहता हूँ 
सूनी-सूनी झंकार, न जाने क्यों उदास रहता हूँ 
यह अमृत चाँद का तनिक न अच्छा लगता 
प्रिय! तुम अपनी रसवंती प्यास मुझे दो। 
कण-कण में चारों ओर छलकती नृत्य-चपल मधुबेला 
झूमे-बेसुध सौंदर्य, लगा है मधुर रूप का मेला 
ऐसी घडियों का व्यंग न सह पाता हूँ 
तुम अपने प्राणों का उच्छ्वास मुझे दो। 
नंदन के चंदन से शीतल छंदों की क्यारी-क्यारी 
सब कुछ देती, देती न मुझे मैं चाँ जो चिनगारी 
रम जाऊँ मैं जिसके अक्षर-अक्षर में 
वह गीली पलकों का इतिहास मुझे दो। 
यह देश तुम्हारे लिए बसाया मैंने सुघर-सलोना 
कोमल पत्तों के बीच जहाँ ओसों का चाँदी-सोना 
उतरूँगा सुख से मैं अंकुर-अंकुर में 
तृण-तरु में मिलने का विश्वास मुझे दो। 

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