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Thursday, 13 August 2015

दहेज़-व्हाट्सएप्प कविताएँ

एक कवि  नदी किनारे खड़ा था

तभी वहा से एक लड़की
का शव तैरता जा रहा था..तो कवी ने उस शव से पूछा.....
.
कौन हो तुम ओ सुकुमारी.
बह रही हो नदी के जल मै |
कोई तो होगा तेरा अपना.
मानव निर्मित इस भू तल मे |
किस घर की तुम बेटी हो.
किस क्यारी की तुम कली हो |
किसने तुमको छला है बोलो.
क्यो दुनियां छोड़ चली हो |
किसके नाम मेंहदी हाथो रची है तेरे.
किसके नाम की बिंदियां माथे सजी हे तेरे |
लगती हो तुम राजकुमारी .
या दैव लोक से आई हो. |
उपमा रहित ये रूप तुम्हारा.
ये रूप कहा से लाई हो |

कवि  की बात सुनकर लड़की की आत्मा
बोलती हे.

कवी राज मुझे क्षमा करो.
गरीब पिता की बेटी हूं |
इसलिये मृत  मीन की भांति.
जल धारा पे लेटी हूं |
रूप रंग और सुंदरता ही.
मेरी पहचान बताते हे |
कंगन चूड़ी मेंहदी बिंदिया.
सुहागन मुझे बनाते हे |
पिता के दुख को दुखी समझा.
पिता के दुख मे दुखी थी मै |
जीवन के इस पथ पर.
पति के संग चली थी मे |
पति को मेने दीपक समझा.
और उसकी लौ मे जली थी मे |
माता पिता का आंगन छोड़कर.
उसके रंग मे रंगी थी मे |
पर वो निकला सौदागर.
लगा दिया मेरा भी मोल |
धन दौलत और दहेज की खातिर.
जल मे पिला दिया विष घोल |
दुनियां रूपी इस उपवन मे.
छोटी सी कली थी मे |
जिसको समझा था माली.
उसी के द्वारा छली थी मे |
ईश्वर से अब न्याय मांगने.
शव शैय्या पर पड़ी हू मे |
दहैज के लोभी इस संसार मे
दहैज की भैंट चढ़ी हूं मे...
दहैज की भैंट चढ़ी हूं मै...

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