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Saturday, 20 June 2015

पंछी की पीड़ा-ईश्‍वर दत्‍त माथुर

पंछी उड़ता डोले है आकाश में
डोल- डोल थक जाए ये तन
जरत दिया मन आस में
पंछी उड़ता डोले है आकाश में ।

उषा की वेला में
पंछी अपने पंख पसार उड़ा
गगन चूम लूँ,
सूरज मेरा, मन में था विश्‍वास बड़ा
सांझ हुई तब लौट चला वो
पिया मिलन की आस में ।

बड़े पेड़ पर नीड़ बनाकर,
कुनबे को उसने पाला था ।
इधर-उधर से दाना लाकर
अपने बच्‍चों को डाला था ।
पंख मिले पड़ चले परिन्‍दे
भूल गया विश्‍वास में ।

बनना और बिगड़ना घर का,
पंछी की है यही कहानी
उजड़े घर को फिर बना लूँगा,
जब तक मेरी रहे जवानी
अनचाही पीड़ा से कैसी,
रहे प्‍यार की प्‍यास में।

पंछी उड़ता डोले है आकाश में ।

ये मन-ईश्‍वर दत्‍त माथुर

हाँ, ये मन प्‍यासा कुआँ है
मन अंधा कुआँ है ।
मन एक ऐसा जुआ है
जो सब कुछ जीत कर भी
अतृप्‍त ही रहता है ।

जिसकी अभिलाषाओं का
पार नहीं ।
ये न मेरी बेबसी देखता है
न मेरी मुफ़लिसी ।

एक जिद्दी औरत की तरह
इसकी माँग मुझे बिकने को
मज़बूर करती है ।
मन पर महावत का अंकुश भी
बेमानी है ।

मन की छटपटाहट, बेचैनी
और उदासी
मुझे उद्वेलित करती है ।
इसके आचरण का
दास बने कोई ।

लेकिन
ये मन साधना की लगाम से
कतराता है, घबराता है ।
जो मन को अपने शिकंजे में
कसने के लिए तैयार तो है
लेकिन वृत्तियों को सहारा
तो देना ही पडेगा ।

श्रम और साधना
उपासना को साकार बना देंगे ।
फिर ये मन
प्‍यासा, अंधा, कुआँ
न जुआ होगा ।

एक विनम्र सदाचारी
विद्यार्थी की तरह
निर्मल रहेगा, ये मन
हाँ ! ये मन ।

रेत के समन्‍दर में सैलाब-ईश्‍वर दत्‍त माथुर

रेत के समन्‍दर में सैलाब आया है
न जाने आज ये कैसा ख़्वाब आया है

दूर तक साँय-साँय-सी बजती थी शहनाई जहाँ
वहीं लहरों ने मल्‍हार आज गाया है ।

अजनबी खुद परछाई से भी डरता था जहॉं
वहीं आइना खुद-ब-खुद उग आया है ।

अनगढ़ा झोंपड़ा मेरे सपनों का महल होता था
मेरे बच्‍चों को फिर वो ही ख़्वाब भाया है ।

करेगा कौन प‍रवरिश मेरी विरासत की
यही सोच के हर बार दु:ख में गीत गाया है ।

जीने का अरमान-ईश्‍वर दत्‍त माथुर

दु:ख में मुझको जीने का अरमान था
सुख आया जीवन में ऐसे
लेकिन मैं कंगाल था ।

लक्ष्‍य नहीं था, दिशा नहीं थी
लेकिन बढ़ते ही जाना था
नहीं सूझता था मुझको कुछ
अपनी ही धुन में गाता था ।

पंख लगाकर समय उड़ गया
लेकिन मैं ग़मख़्वार था ।

सुख की बदली ऐसी आई
मन में केवल प्रीत समाई ।
दिन के पंख लगे कुछ ऐसे
शेष नहीं केवल परछाईं ।

अब अपने ही लगे डराने
लेकिन मैं लाचार था ।

मर्यादा का मुखौटा-ईश्‍वर दत्‍त माथुर

ये क्‍या है,
जो मानता नहीं
समझता नहीं
समझना चाहता नहीं
कुछ कहता नहीं
कुछ कहना चाहता नहीं।
तुम इसे गफ़लत का नाम दो
मैं इसे मतलब का ।

तुम्‍हारा समर्पण, निष्‍ठा
कहीं मेरे स्‍वार्थ के शिकार तो नहीं
तुम्‍हारी अटूट श्रद्धा ने
मुझे न जाने क्‍या समझा है
लेकिन मैं अन्‍दर तक जब भी
झाँकता हूँ अपने गिरेबाँ में तो
नज़र आता है केवल
मेरा बौनापन
विकृत मानसिकता,

जिसे दिन के उजाले में
मैं ढाँपे रहता हूँ
मर्यादा के मुखौटे से
सामाजिक शिष्‍टाचार से ।